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सिंगल वरिष्ठ नागरिकों को अब राशन के लिए दुकान पर जाने की जरूरत नहीं

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जयपुर। खाद्य सुरक्षा सूची में शामिल ऐसे वरिष्ठ नागरिक एवं निशक्तजन जो सिगल हैं और किसी कारण उचित मूल्य की दुकान पर जाकर राशन सामग्री लाने में असमर्थ हैं अब वे किसी को भी भेजकर सामग्री मंगवा सकेंगे। उन्हें राशन डीलर उनके घर आकर ही फूड कूपन देकर जाएगा। इस संबंध में विभाग की ओर […]

DHARAM/SAMAJ

गौड़ ब्राह्मण समाज की 21 प्रतिभाओं को विप्र विभूषण मानद अलंकरण

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जयपुर। गौड़ सनाढ्य फाउंडेशन का प्रथम राष्ट्रीय अधिवेशन बिड़ला आॅडिटोरियम में हुआ। इसमें समाज की 21 प्रतिभाओं को विप्र विभूषण के मानद अलंकरण से सम्मानित किया है। सम्मानित किए जाने वालों में डॉ. केदार शर्मा, अंतरराष्ट्रीय ज्योतिष आचार्य पं. पुरुषोत्तम गौड़, समाजसेवी भवानी शंकर शर्मा, अंतरराष्ट्रीय वास्तु विशेषज्ञ डीडी शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार जेपी शर्मा, पत्रकार […]

EDUCATION

10 सीजीपीए के साथ स्टूडेंट्स ने बढ़ाया एमपीएस इन्टरनेशनल का गौरव

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प्राचार्य व सचिव ने सफल विद्यार्थियों को इसी प्रकार आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देते हुए दी शुभकामनाएं जयपुर। ‘एकेडमिक एक्सीलेंस‘ ही एम.पी.एस. इन्टरनेशनल स्कूल लक्ष्य है, इस बार सीबीएसई दसवीं के परीक्षा परिणाम ने यह बात साबित कर दी। स्कूल के 23 विद्यार्थियों ने 10 सीजीपीए प्राप्त करके स्कूल का नाम उंचा किया है। […]

CRIME/POLICE NEWS

स्नेह मिलन समारोह में अन्नकूट की जीमी प्रसादी

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जयपुर। माहेश्वरी समाज की ओर से तिलक नगर स्थित माहेश्वरी सीनियर सैकंडरी स्कूल में अन्नकूट प्रसादी महोत्सव और दिवाली स्नेह मिलन समारोह आयोजित किया गया। इस अवसर पर भगवान श्रीनाथजी के समक्ष 108 व्यंजनों की झांकी सजाकर महाआरती की गई। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि सीए दिनेश और विशिष्ट अतिथि गिरिराज प्रसाद सोमानी और संजय काबरा रहे। […]

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कहानी— सन्नाटा
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कहानी— सन्नाटा

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-रणवीर सिंह राही
रात का अन्तिम पहर….ठिठुरती सर्दियां…ठण्ड से शरीर जकड़ सा गया था। कमरे में सुगंधा, मैं और था सिर्फ सन्नाटा। विचार सहमे हुए ….और शब्द मौन….। मन्दिर की घंटियों के स्वर रात के सन्नाटे को बींध रहे थे। अलसुबह हो गई थी शायद.., पर रात का अंधकार अभी भी उतना ही गहन, उतना ही खामोश था। मन की घुटन रातभर चहलकदमी करते-करते भी थकी नहीं थी। आंखों में रतजगे के बाद भी नींद नहीं थी, था तो सिर्फ एक सन्नाटा…गहन सन्नाटा….।
सुबह की आहट होते ही, रातभर से बेजान सुगंधा दरवाजा खोलकर बाहर निकली थी। कमरे में फिर वही खामोशी, फिर वही शून्यता…..। यह सन्नाटा पहले घर में, फिर मन में….और सवेरा होते ही घर के बाहर चला जायेगा…। मन की उलझन और उलझती जा रही थी। कौन जाने यह कब सुलझेगी,और सुलझेगी भी या नहीं। यह सवाल ही था, जो मन में एक गुत्थी बन गया था। यही सोच था, जिसे सोचते-सोचते करवटों में ही गुजर गई थी सारी रात।
भोर की पहली किरण से शहर जगमगाने लगा था, पर मेरी मनःस्थिति ठीक इसके विपरीत थी। सवेरा जैसे जैसे उजला हो रहा था, वैसे-वैसे ही मन का अंधेरा और गहरा होता जा रहा था। मन की पीड़ा ही ऐसी थी, जिसे शब्दों में अभिव्यक्त करना असंभव था। अभिव्यक्ति का अर्थ हर तरफ बदनामी….और चुप्पी? चुप्पी का मतलब, अपनी ममता का गला घोटना…….।
आधी रात तक बहुत भाग-दौड़ की थी, पर सब कुछ व्यर्थ, नतीजा शून्य… और अन्त में नाकामयाबी ही नाकामयाबी….। सारे प्रयास विफल…,सारे परिचय बोने। समझ नहीं पा रहा था कि जाउं तो जाउं कहां? घर आया तो सुगंधा का बुरा हाल हो रहा था, रो-रो कर अपना आपा खो चुकी थी,वह। मुझे देखते ही लिपट गई थी-
-क्या हुआ, आलोक? कुछ भी करो, पर मुझे मेरी काजल लाकर दे दो। हमारी तो किसी से दुश्मनी भी नहीं थी, फिर कौन ले गया हमारी बेटी को ? तुम तो हमेशा कहते थे, ‘‘सुगंधा, मैं कोई छोटा-मोटा जर्नलिस्ट नहीं हूॅं, माना हुआ क्राइम रिपोर्टर हूॅं। किसी भी अपराध घटना की इतनी इन्ट्रेस्टिंग लाइव स्टोरी मेरे अलावा कोई नहीं बना सकता। मेरी स्टोरी पाठक को हमेशा ऐसा आभास देती है, जैसे वह उसे पढ़ नहीं, देख रहा हो।
नहीं जानता कि सुगंधा मेरी तारीफ कर रही थी, या तौहीन…, मेरा हौसला बढ़ा रही थी, या हिम्मत तोड़ रही थी। उसके शब्दों की चुभन मैं अन्दर तक महसूस कर रहा था। धीरे-धीरे लगातार बढ़ता हीे जा रहा था, उसका बिलखना–
-कुछ भी करो, आलोक, कहां गई तुम्हारी जान-पहचान….? बहुत रोकती थी, पर तुम नहीं माने। कहते थे, कि ये शहरी गुण्डे हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकते….। मेरी संत्री से लेकर मंत्री तक चव्वनी चलती है। एक फोन किया और सब अन्दर…।
– हमारा समय ही नाजुक आ गया है। आधी रात तक मदद के लिये भटक आया, पर कोई रास्ता नहीं मिला। मंत्री आउट आॅफ स्टेशन है। एस.पी. साहब ने जरूर इंचार्ज को फोन कर दिया है। पर उसने भी आश्वासन ही दिया है-
-आप चिन्ता मत कीजिये, आलोक साहब। एस.पी. साहब ने भी आपकी सिफारिश की है। उनके फोन के साथ ही पुलिस हरकत में आ गई है। आप इत्मीनान रखिये। पुलिस कन्ट्रोेेेल रूम से शहर के हर चैराहे और रास्ते पर नाकाबंदी कर आने-जाने वाले से पूछताछ की जा रही  है। संदिग्ध स्थानों पर पुलिस टोलियां भी रवाना कर दी गई हैं। थोड़ी हिम्मत तो आपको भी रखनी पड़ेगी। समय जरूर लग सकता है, पर अपराधी पुलिस से बच नहीं सकता…। यह बात तो आप भी जानते ही हैं कि अपराधी पुलिस को बता कर तो अपराध करता नहीं है कि आपने रिपोर्ट लिखाई और पुलिस अपराधीे को गिरफ्तार कर ले। हमने तहकीकात शुरू कर दी है, इसमें थोड़ा वक्त तो लगेगा ही। सूचना मिलते ही आपको रिंग कर देंगे।
टूटी हुई हिम्मत से ही सुगंधा को हौसला देने की कोशिश की थी। यह बात जानते हुए भी कि सिर्फ दिलासाओं हिम्मत नहीं आती। ठोस प्रयास न हमारे वश में थे, न पुलिस के….. फिर भी एक उम्मीद को जिन्दा रखना जरूरी था।
सारी रात न आॅंखों में नींद थी, न मन में चैन…। एक माॅं-बाप की अन्तरात्मा ही जानती है कि औलाद का वियोग क्या होता है? रातभर आॅंखों में नींद की जगह एक सन्नाटा भरा था, एक बैचेनी बसी थी। रात भर रोते-रोते सुगंधा की आॅंखें भी सूज गई थी। काजल की कुछ घंटों की जुदाई ने हमसे हमारी सारी क्षमताएं छीन ली थी। लाचार, बेजान से लाशों की तरह हो गये थे हमारे शरीर…।
शहर में आये दिनहोने वाली ऐसी दुर्घटनाओं से कभी-कभी तो लगता है कि शहर का माहौल अब किसी के लिये भी महफूज नहीं है, पर शहर छोड़कर कोई जायेें भी तो जायें कहां? घीरे-धीरे हर इन्सान ऐसी दहशतों का आदी होता जा रहा है। अखबार की खबरें पढ़कर इन्सान थोड़े समय तक तो चिन्तित  रहता है, संभलकर भी चलता है, पर फिर भूल जाता है। और व्यस्त हो जाता है अपनी रूटीन लाइफ में….।
उजाला खिड़कियों से अन्दर झांकने लगा था। उदास सी सुगंधा फिर कमरे में आ गई थी । वह अब भी रोे रही थी, मगर आॅंखों से नहीं, दिल से, आॅंखों के आॅंसू तो कब के सूख गये थे। मोबाइल की रिंगटोन ने मेरे विचारों की श्रृंखला को तोड़ डाला था-
-यस…।
-आलोक जी, मैं कोतवाली से राठौड़..
-हां कहिये , सर।
– पुलिस को एक लड़की की लाश बरामद हुई है। उसकी उम्र भी आपकी बेटी के बराबर सी ही है। आप तुरंत यहां चले आयें, ताकि लाश की पहचान हो सके।
– लाश…?
लाश का नाम सुनते ही शरीर में सनसनी सी दौड़ गई थी, पैरों की जमीन मानों नीचे धॅंस गई थी। सुगंधा हमारी बात सुनते ही जोर-जोर से रोने लगी थी। मैंने उसे चुप कराते हुए कहा था-
-चुप हो जाओ, सुगंधा, यह लड़की काजल नहीं है।
क्हने को तो मैं कह गया था, पर मेरे हालात इतने विचित्र हो गये थे कि आॅंखों के आगे अॅंधेरा गहराने लगा था। एक क्षण के लिये धरती आकाश तेजी से घूम गये थे। यह तो शुक्र था कि मैं बैड पर लेटे हुए था। यदि खड़ा होता तो गश खाकर कभी का गिर गया होता। मेरा मन भी दहाड़े मार कर रोने हो रहा था। समझ नहीं आ रहा था कि खुद रोउं, या सुगंधा को चुप कराउं …।
इन्सपेक्टर ने जो कुछ भी कहा था, वह सब मैं नहीं सुन पाया था। मौत का नाम ही इतना घिनौना होता है कि सुनने से पहले मन घबरा जाता है। राठौड़ के आखिरी शब्द अब भी कानों में गूंज रहे थे-
-मि. आलोक, लड़की की डेडबाॅडी माॅरचरी में रखी हुई है, आप जल्दी से कोतवाली आ जायें, ताकि हम हाॅस्पीटल चलकर डेडबाॅडी की पहचान कर लें।
बात पूरी होते ही फोन कट गया था। एक सवाल अभी भी मेरे जहन में घूम रहा था-
-आलोक, यह डेडबाॅडी यदि काजल की हुई तो मैं क्या करूंगा? सुगंधा को कैसे समझाउंगा? वह तो जीते जी ही मर जाायेगी…।
विचारों का तूफान इतनी तेजी से मन मस्तिष्क में घूम रहा था कि मैं अपनी सुध-बुध खो बैठा था…। गुमसुम….एकदम मौन….। सुगंधा ने ही विचारों की तन्द्रा तोड़ी थी-
-आलोक, बताओ ना, इन्सपेक्टर क्या कह रहा था? हमारी काजल दुनिया में है भी, या नहीं।
– इन्सपेक्टर? कुछ नहीं…। हमारे रिश्तेदारों और परिचितों के नाम, पते और टेलीफोन नम्बर मांग रहा था, ताकि वह उनसे काजल के बारे में पूछ सके।
-पुलिस हमारे ही रिश्तेदारों से पूछेगी कि हमारी काजल को उन्होंने तो अगुवा नहीं किया। क्यों? पर बदमाशों से कभी नहीं पूछेगी। आलोक मुझे तो लगता है कि हमारी काजल को उन बदमाशों ने अगुवा किया होगा, जिनकी क्राइम न्यूज तुमने अपने न्यूजपेपर में पब्लिश करते रहे हो। यह तो अपराधियों और मीडिया की आपसी रंजिश का मामला लगता है, जिसके शिकार हम हुए हैं।
सुगंधा की यह बात सही भी हो सकती है। पहली बार उसने अपने दिमाग का सही दिशा में यूज किया था। अपनी क्राइम न्यूज के माध्यम से मैंने ऐसे अपराधियों को भी बेनकाब किया था, जिन्हें पुलिस बीस वर्षों में भी नहीं पकड़ पाई थी। मेरी न्यूज सीरीज ने ऐसे केस भी री-आॅपन किये थे, जिन्हें पुलिस ने एफ.आर. लगा कर कभी के बंद कर दिये थे।
अपराधियों द्वारा क्राइम रिपोर्टर को अपना जातीय दुश्मन समझ लेना, कोई नई बात नहीं थी। पत्रकारिता में मुझे दस वर्ष से भी ज्यादा समय हो गया था। सबसे पहले मुझे क्राइम बीट ही मिली थी और आज तक उसी में चल रहा था। मेरी फर्स्ट रिपोर्टिंग को इतना ​रिस्पाॅंस मिला था कि पिछले बीस सालों से फरार एक बलात्कारी भी गिरफ्तार हुआ था। जवानी में किये अपराध की सजा उसे बुढ़ापे में आकर मिली थी और नवयौवना उम्र में प्रताड़ित हुई लड़की को दादी बनने के बाद न्याय मिला था। इस न्यूज पर तो मुझे सम्मानित भी किया गया था।
ठीक आठ बजे मैं कोतवाली पहुॅंच गया था। इन्सपेक्टर ने मुझे एक लिफाफा दिया था, जिस पर किसी का भी नाम पता नहीं था। कंपकंपाते हाथें से पत्र खोलकर पढ़ने लगा था-
– आदरणीय मम्मी-पापा,
चरण स्पर्श,
आपकी बेटी काजल ने अपने और आपके मुंह पर ऐसी कालिख पोत दी है, जिसे किसी भी गंगाजल से नहीं धोया जा सकता । यह समझ लेना कि आपके काजल नाम की कोई बेटी हुई ही नहीं थी। असफल जिन्दगी जीने से कोई फायदा नहीं है। सिर्फ नुकसान उठा कर जिन्दगी को भला कौन इन्सान जी सकता है? यही सोच कर मैं आपसे इतनी दूर चली जाना चाहती हूॅं कि आपको कभी भी मेरे बेटी होने का अफसोस न हो। मुझे आशा है कि आप मुझे अपनी बेटी समझकर जरूर माफ कर देंगे।
सागर को मैं बहुत प्यार करती थी, आज भी करती हॅूं और मरने के बाद भी करती रहूंगी। यह जानते हुए भी कि मेरा सागर भी उतना ही खारा था, जितना उसका नाम…। मैं उससे बेहद प्यार करती थी। प्यार चीज ही ऐसी है, जो एक बार हो जाता है तो कभी खत्म नहीं होता। मैं उसी के साथ अपनी जिन्दगी बिताना चाहती थी, पर वह हमेशा मुझे यूज करता रहा। फिर भी मैं उसके झूठे प्यार पर अपना सबकुछ न्योछावर करती जा रही थी, पर उसने कभी मेरी भावनाओं को नहीं समझा। वह हमेशा मुझे छलता रहा।
जब मुझे होश आया तो बहुत देर हो चुकी थी। पापा, आज जब मैं उसके बच्चे की मां बन गई हूं तो वह मुझे दुत्कार कर चला गया। मुझे मेरे जीवन से घृणा सी हो गई है। मैं नहीं चाहती कि कोई मेरे प्यार को नफरत की नजर से देखें। इसीलिये मैं बदनाम जिन्दगी जीने से अच्छा समझती हूं कि मौत को गले लगा कर अब नई जिन्दगी की तलाश की जाये।
अच्छा तो अब मैं चलती हूं। अलविदा!
आपकी काजल।
पत्र समाप्त करते ही आॅंखों के आगे धुंधलका छाने लगा था। मैं वहीं कुर्सी पर बैठ गया था। बैठते ही टेबल पर रखे न्यूजपेपर पर नजर गई तो आॅंखें खुली की खुली रह गई थी। उसमें बड़ी-बड़ी हैडलाइन में लिखा था-
‘‘पत्रकार की इकलौती बेटी ने की आत्महत्या, दो वर्षों से थी देह शोषण की शिकार’’
शहर का सन्नाटा आज मेरे मन पर छा गया था। आॅंखों के आगे का धुंधलका और गहरा हो गया था। काजल का लाचार चेहरा अब भी मेरी आॅंखों के आगे आ खड़ा हुआ था।

बुद्धरकों का मौहल्ला,झोटवाड़ा,
जयपुर-12  
दूरभाषः-0141-2740766. कार्यालय
0141-2340357. निवास
मोबाइल-7597923598  

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